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    ....वर्ना राहुल गांधी बनकर रह जाएंगे 'आम आदमी' अरविंद केजरीवाल!

    दिल्ली एमसीडी के नतीजे जाहिर हो चुके हैं. नतीजों में बीजेपी को मिली भारी जीत पर शायद ही किसी को ताज्जुब हुआ हो क्योंकि तमाम एग्जिट पोल पहले ही एमसीडी के नतीजों में पार्टी के लिए 200 और उसके करीब का आंकड़ा बता चुके थे.
    वैसे तो एग्जिट पोल में यह भी सामने आया था कि आम आदमी पार्टी दूसरे स्थान पर रह सकती है लेकिन, जिस तरह से असल नतीजों में कांग्रेस ने आप के करीब सीटें हासिल की हैं उसमें दूसरे और तीसरे स्थान का कोई खास मतलब नहीं बचा है. क्योंकि 270 सीटों के चुनाव में 10 सीटों का फर्क होना बहुत ही मामूली है.
    कांग्रेस का यही उभार इन नतीजों का सबसे बड़ा संकेत भी है. एमसीडी के नतीजों को यूपी चुनावों के नतीजे के एक्सटेंशन के रूप में देखा जा रहा है और सीधे तौर पर मोदी लहर का असर बताया जा रहा है.
    लेकिन, ये नतीजों का केवल एक पहलू है, जिससे नकारापन और भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद लगातार तीसरी बार बीजेपी को मिली भारी जीत का विश्लेषण किया जा सकता है.
    नतीजों का दूसरा पहलू यानी अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली उस पार्टी की अभूतपूर्व हार जिसे महज 2 साल पहले दिल्ली ने विधानसभा की 70 में से 67 सीटों का तोहफा दिया था उसे मोदी लहर कहने भर से नहीं समझा या समझाया जा सकता है.
    ये लहर नहीं कुछ और है..
    लहर एक फौरी घटना होती है जिसके आने से बड़े-बड़े जहाज, चट्टान नजरों से ओझल हो जाते हैं. लेकिन जैसे ही लहर गुजरती है, जहाज, चट्टान सब फिर अपने पूरे अस्तित्व से प्रकट हो जाते हैं.
    तो क्या माना जाए कि मोदी लहर के गुजरते ही अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी एक बार फिर दिल्ली के जनमानस पर छा जाएगी? ऐसा कभी नहीं होगा और यही दिल्ली के एमसीडी नतीजों का निचोड़ है.
    इसकी तुलना साल 2015 में कांग्रेस को मिली करारी हार से कर अगले चुनाव में आप के फिर उभरने की उम्मीद करने वाले उतने ही गलत साबित होंगे जितना एमसीडी को स्थानीय चुनाव बताकर इसमें मोदी का असर नहीं होने की बात कहने वाले.
    एमसीडी के ये नतीजे आम आदमी पार्टी के अस्तित्व पर इतनी बड़ी चोट है कि उनसे उबरने के लिए केजरीवाल को किसी दैवीय नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करना होगा..उससे कम पर बात नहीं बनेगी.
    अगर केजरीवाल ऐसा नहीं कर पाए तो वह विपक्ष की राजनीति में एक और राहुल गांधी बन कर रह जाएंगे.
    एमसीडी में आप की हार मोदी लहर की जीत से ज्यादा केजरीवाल की नकारात्मक राजनीति की हार है क्योंकि साल 2015 में आप को मिली प्रचंड जीत लोकसभी की सातों सीटों पर बीजेपी की जीत की पृष्ठभूमि में ही थी.
    यह केवल राजनीतिक हार नहीं है यह नैतिक हार भी है. इसलिए कि साल 2015 में केजरीवाल को मिली जीत राजनीतिक से ज्यादा एक नैतिक जीत थी. लेकिन, पिछले 2 सालों में केजरीवाल ने जिस तरह की राजनीति का प्रदर्शन किया है उस पर यह दिल्ली की जनता का जवाब है.
    बीजेपी ने उतारे नए उम्मीदवार
    कमाल की बात ये है कि अमित शाह ने सभी 272 सीटों पर अपने उम्मीदवार बदलकर एक तरह से खुद यह स्वीकार कर लिया कि उनके एक भी उम्मीदवार ने जनता की उम्मीदों को सुरक्षित नहीं रखा और उनमें से सब के सब भ्रष्ट और नकारा थे.
    दूसरी ओर दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार ने बिजली...पानी..शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े बुनियादी मोर्चों पर कुछ ऐसे काम किए जिनकी गूंज विश्व मंचों तक पर सुनाई दी है. फिर भी जनता ने केजरीवाल को नकार कर शाह-मोदी की राजनीति को पसंद किया..आखिर क्यों?
    साफ है कि दिल्ली की जनता हकीकत से ज्यादा उम्मीदों को प्रीमियम दे रही है. केजरीवाल ने उपलब्धियों पर बात करने के लिए मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन को चुना जबकि स्वयं उन्हें जहां भी मौका मिला उन्होंने नरेंद्र मोदी की कमियों की बात की.
    जनता के बीच उनकी सकारात्मकता के बजाए केवल नकारात्मकता पहुंची...पहले पंजाब और फिर ईवीएम. धीरे-धीरे आम जनता के मन में केजरीवाल की एक ऐसी छवि बैठ गई जिसके पास कोई उम्मीद नहीं हैं, न ही कोई सपना है.
    केजरीवाल की छवि एक ऐसे आदमी की बन गई जिसे कुछ भी करने के बजाए केवल 'कुछ भी नहीं' करने के कारण गिनाने से मतलब है जो केवल मीडिया ड्रामा में यकीन रखता है.
    और फिर 21 विधायकों के ऑफिस ऑफ प्रॉफिट विवाद..सत्येंद्र जैन के हवाला विवाद और सबसे हाल में 12 हजार रुपये थाली के विवाद से केजरीवाल की ईमानदारी की एकमात्र स्वघोषित चमक भी कुंद पड़ गई.
    वहीं दूसरी ओर मोदी-शाह ने जनता को यह समझाने में सफलता पाई कि ये नई बीजेपी है. पुराने कॉरपोरेटर और मेयर गुजरे जमाने की बात है और नई एमसीडी का प्रदर्शन मोदी-शाह की गारंटी होंगे.
    यूपी में योगी आदित्यनाथ सरकार के एक महीने के कामकाज ने भी इस धारणा को मजबूत बनाने में और मदद की. दिक्कत ये है कि केजरीवाल कभी आंदोलनकारी के खोल से निकलकर एक जिम्मेदार राजनेता की भूमिका में आ ही नहीं पाए.
    इसलिए जनता ने उन्हें उनकी जगह दिखा दी है. एमसीडी के नतीजे केवल कोई लहर नहीं हैं जिसके शांत होने के बाद केजरीवाल फिर से अपना अस्तित्व पा लेंगे.
    यह नदी का अपनी राह बदलने के जैसा है जिसके बाद भूभाग के नजारे हमेशा के लिए बदल जाते हैं और इस बदले नजारे में कांग्रेस का जहाज एक बार फिर पानी पा कर तैरना शुरू कर सकता है.

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